GANGA RIVER
डॉ. संजय पांडेय/ नई दिल्ली। GANGA RIVER को प्रदूषण मुक्त बनाने के लिए 40 साल से चल रहे सरकारी प्रयास कुछ न कर पाए। गंगा एक्शन प्लान से लेकर नमामि गंगे मिशन तक हजारों करोड़ रुपये खर्च किए गए, फिर भी नदी के कई हिस्सों में प्रदूषण का दबाव बना हुआ है। भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (सीएजी) की उत्तराखंड पर आधारित ताजा प्रदर्शन ऑडिट रिपोर्ट ने इस पूरे अभियान के लागु होने पर प्रश्नचिह्न लगा दिए हैं।
सीएजी की रिपोर्ट बताती है कि नमामि गंगे कार्यक्रम के तहत सीवेज शोधन, सीवर नेटवर्क, जल गुणवत्ता निगरानी और प्रदूषण नियंत्रण के लिए तैयार किए गए बुनियादी ढांचे का बड़ा हिस्सा अपने उद्देश्य के अनुरूप काम नहीं कर रहा है। कई सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट (एसटीपी) या तो क्षमता से अधिक बोझ झेल रहे हैं, या फिर तकनीकी खामियों और रखरखाव की कमी के कारण गंगा में बिना शोधित सीवेज जाने से रोकने में विफल हैं। कई स्थानों पर करोड़ों रुपये खर्च कर तैयार किए गए संयंत्र आज भी अधूरे या निष्क्रिय पड़े हैं।
रिपोर्ट के अनुसार उत्तराखंड में 44 एसटीपी में से 12 संयंत्र सीधे या परोक्ष रूप से बिना उपचारित सीवेज को गंगा और उसकी सहायक नदियों तक पहुंचने से नहीं रोक सके। सीएजी का कहना है कि वर्ष 2017-18 में की गई पिछली ऑडिट में जिन कमियों की ओर ध्यान दिलाया गया था, उनमें से अधिकांश आज भी बरकरार हैं। रिजल्ट -चार दशक बाद भी गंगा को स्वच्छ बनाने का सपना अधूरा है।
कच्चा सीवेज सीधे नदी में छोड़ा गया
ऑडिट के दौरान यह भी सामने आया कि एक एसटीपी के संचालन के लिए जिम्मेदार ठेकेदार ने संग्रहण टैंक से कच्चा सीवेज सीधे गंगा में छोड़ दिया। फरवरी 2023 में निरीक्षण के दौरान यह मामला पकड़ में आया, लेकिन रिपोर्ट के अनुसार न तो ठेकेदार के खिलाफ और न ही जिम्मेदार अधिकारियों के विरुद्ध कानूनी कार्रवाई की गई।
रखरखाव की अनदेखी से बिगड़ी व्यवस्था
रिपोर्ट बताती है कि 44 में से 18 एसटीपी की हालत इतनी खराब थी कि रखरखाव एजेंसियों ने उन्हें अपने जिम्मे लेने से इनकार कर दिया। इसका सीधा असर संयंत्रों के संचालन और निगरानी पर पड़ा।

GANGA RIVER : अधिकांश संयंत्र पर्यावरण मानकों पर असफल
जनवरी से मार्च 2023 तथा अगस्त से नवंबर 2023 के बीच हुई जांच में अधिकांश एसटीपी राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) और पर्यावरण मंत्रालय के मानकों पर खरे नहीं उतरे। गंगा में पहुंचने वाले सीवेज की गुणवत्ता अब भी गंभीर चिंता का विषय है।
जल गुणवत्ता में नहीं आया अपेक्षित सुधार
रिपोर्ट के अनुसार फीकल कोलिफॉर्म जैसे मलजनित बैक्टीरिया का स्तर कई स्थानों पर सुरक्षित सीमा से बहुत अधिक पाया गया। देवप्रयाग से हरिद्वार तक गंगा के जल में प्रदूषण का स्तर लगातार बढ़ता गया। कोविड-19 के दौरान कुछ समय के लिए जल गुणवत्ता में सुधार देखा गया, लेकिन उसके बाद स्थिति फिर पहले जैसी हो गई। केंद्रीय और राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के आंकड़ों में भी बड़ा अंतर मिला, जिससे निगरानी प्रणाली की विश्वसनीयता पर सवाल उठे हैं।
करोड़ों खर्च, फिर भी अधूरी सीवरेज व्यवस्था
ऑडिट में पाया गया कि सात कस्बों में बनाए गए 21 एसटीपी किसी भी घर से सीवर नेटवर्क के माध्यम से जुड़े ही नहीं।करोड़ों रुपये खर्च होने के बावजूद उनका उपयोग नहीं हो सका। जोशीमठ सहित कई शहरों में सीवरेज अवसंरचना तैयार कर दी गई, लेकिन घरों को कनेक्शन नहीं मिलने से पूरी परियोजना लगभग निष्प्रभावी बनी रही। चमोली, उत्तरकाशी और श्रीनगर जैसे शहरों में बड़ी संख्या में घर अब भी सीवर नेटवर्क से बाहर हैं। इससे घरेलू गंदा पानी नालों के माध्यम से सीधे गंगा और उसकी सहायक नदियों तक पहुंचता रहा।
कहीं क्षमता से अधिक दबाव, कहीं खाली पड़े संयंत्र
सीएजी ने योजना निर्माण की खामियों को भी उजागर किया है। हरिद्वार का 68 एमएलडी क्षमता वाला एसटीपी पहले ही अपनी निर्धारित सीमा से अधिक सीवेज का उपचार कर रहा है, जबकि ऋषिकेश का पांच एमएलडी संयंत्र अपनी क्षमता से कई गुना अधिक दबाव झेल रहा था। इसके विपरीत देवप्रयाग का एसटीपी अपनी क्षमता के केवल तीन से चार प्रतिशत पर संचालित हो रहा था। इससे स्पष्ट है कि वास्तविक आवश्यकता का समुचित आकलन किए बिना परियोजनाएं तैयार की गईं।
जहरीला स्लज किसानों में बांटा गया
रिपोर्ट का सबसे गंभीर पहलू एसटीपी से निकलने वाले स्लज के प्रबंधन से जुड़ा है। हरिद्वार के तीन संयंत्रों से निकले स्लज में जिंक और कैडमियम जैसी भारी धातुएं निर्धारित मानकों से अधिक मात्रा में पाई गईं। इसके बावजूद बड़ी मात्रा में यह स्लज किसानों को खेतों में उपयोग के लिए वितरित कर दिया गया। इससे मिट्टी की गुणवत्ता और खाद्य सुरक्षा पर भी गंभीर प्रश्न खड़े होते हैं।
दूसरी ओर स्लज के सुरक्षित निस्तारण के लिए करोड़ों रुपये की लागत से तैयार संयंत्र शुरू होने के बाद भी कभी संचालित नहीं किया गया, जबकि संबंधित ठेकेदार को पूरा भुगतान कर दिया गया था।
जोखिम वाले स्थानों पर बने एसटीपी
ऑडिट के अनुसार 44 में से 17 एसटीपी ऐसे स्थानों पर बनाए गए जहां भूस्खलन, बाढ़ या अन्य प्राकृतिक जोखिम अधिक थे। एक एसटीपी भूस्खलन में पूरी तरह नष्ट हो गया। चमोली में एक एसटीपी परिसर में करंट लगने की दुर्घटना में 16 लोगों की मौत और कई अन्य लोगों के घायल होने का भी उल्लेख रिपोर्ट में किया गया है। इससे सुरक्षा मानकों के पालन पर भी गंभीर सवाल उठे हैं।
वित्तीय प्रबंधन और पर्यावरणीय उपायों में भी कमी
रिपोर्ट बताती है कि वनीकरण के लिए स्वीकृत धनराशि का बहुत कम हिस्सा ही खर्च किया गया। ठोस कचरा प्रबंधन की दिशा में भी अपेक्षित प्रगति नहीं हुई। कई श्मशान घाट उपयोग में नहीं आए, जबकि ठेकेदारों से वसूली जाने वाली बड़ी राशि भी पूरी तरह नहीं वसूली गई। इससे परियोजनाओं के वित्तीय प्रबंधन पर भी प्रश्न उठे।
सफाई के लिए वर्ष 1985 में गंगा एक्शन प्लान से शुरू हुआ था। इसके बाद गंगा एक्शन प्लान-दो, राष्ट्रीय गंगा नदी बेसिन प्राधिकरण और वर्ष 2014 में नमामि गंगे कार्यक्रम शुरू किए गए। इन योजनाओं पर अब तक हजारों करोड़ रुपये खर्च किए जा चुके हैं, लेकिन जब तक सीवेज प्रबंधन, सीवर नेटवर्क, प्रदूषण नियंत्रण और परियोजनाओं के रखरखाव में व्यापक सुधार नहीं किए जाते, तब तक गंगा को निर्मल बनाने का राष्ट्रीय संकल्प अधूरा ही रहेगा।
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