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Reading: नाबालिग के साथ लिव-इन में सुरक्षा नहीं : Punjab and Haryana HC
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Telescope Times > Blog > MY PUNJAB > नाबालिग के साथ लिव-इन में सुरक्षा नहीं : Punjab and Haryana HC
PUNJAB AND HARYANA HIGHCOURT नाबालिग के साथ लिव-इन में सुरक्षा नहीं
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नाबालिग के साथ लिव-इन में सुरक्षा नहीं : Punjab and Haryana HC

The Telescope Times
Last updated: August 5, 2026 8:34 am
The Telescope Times Published August 5, 2026
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PUNJAB AND HARYANA HIGHCOURT -नाबालिग के साथ लिव-इन में सुरक्षा नहीं
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LUDHIANA / चंडीगढ़ : Punjab and Haryana HC ने 3 अगस्त के एक आदेश में, 16 साल की लड़की और उसके बालिग साथी की सुरक्षा की याचिका खारिज कर दी। कोर्ट ने कहा कि नाबालिग के साथ लिव-इन रिलेशनशिप में सुरक्षा नहीं दी जा सकती। कोर्ट ने कहा कि ऐसी सुरक्षा देने का मतलब होगा नाबालिग के साथ लिव-इन रिलेशनशिप को अप्रत्यक्ष रूप से बढ़ावा देना, जिसकी कानून इजाज़त नहीं देता।

याचिकाकर्ताओं ने पुलिस सुरक्षा की मांग की थी। उनका आरोप था कि लड़की के परिवार से उन्हें खतरा है क्योंकि वे लड़की के बालिग होने पर शादी करना चाहते थे। कोर्ट के आदेश के मुताबिक, 16 साल की लड़की और बालिग पुरुष ने दावा किया कि उन्हें अपनी जान और आज़ादी का खतरा है।

याचिकाकर्ताओं का आरोप था कि जब उन्होंने अपने परिवारों को अपने रिश्ते के बारे में बताया, तो लड़की के माता-पिता ने उसे किसी और से शादी करने के लिए मजबूर करने की कोशिश की। उन्होंने दावा किया कि जब उसने इनकार किया, तो उसे पीटा गया और जान से मारने की धमकी दी गई। लड़की ने आरोप लगाया कि वह 22 जुलाई, 2026 को अपना घर छोड़कर उस पुरुष के साथ रहने लगी। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि उसके एक रिश्तेदार ने उन्हें जान से मारने की धमकी देते हुए एक वॉयस नोट भेजा था।

इसके बाद जोड़े ने कोर्ट का रुख किया ताकि पुलिस को उनकी जान की सुरक्षा करने और लड़की के परिवार वालों को उनके मामलों में दखल देने से रोकने का निर्देश दिया जा सके।

हाई कोर्ट ने याचिका क्यों खारिज की?

जस्टिस सुमीत गोयल ने पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट की डिवीज़न बेंच के एक पुराने फैसले का हवाला दिया, जिसमें कहा गया था कि लिव-इन रिलेशनशिप में नाबालिग कोर्ट से सुरक्षा नहीं मांग सकते। कोर्ट ने कहा कि कानून नाबालिगों पर कुछ पाबंदियां लगाता है क्योंकि उन्हें ऐसे फैसले खुद लेने में असमर्थ माना जाता है और उनकी भलाई ही मुख्य चिंता होती है।

कोर्ट ने कहा, “ऐसे हालात में सुरक्षा देने का मतलब होगा नाबालिगों के साथ लिव-इन रिलेशनशिप को अप्रत्यक्ष रूप से मंज़ूरी देना। यह बात उस स्थापित कानूनी ढांचे के खिलाफ है जो कम उम्र और आसानी से प्रभावित होने वाले लोगों को शोषण और नैतिक खतरों से बचाने के लिए बनाया गया है।”
हाई कोर्ट ने याचिका खारिज कर दी और लुधियाना के पुलिस कमिश्नर को कानून के मुताबिक ज़रूरी कदम उठाने का निर्देश दिया।

कोर्ट ने आगे कहा कि ऐसे मामलों में सुरक्षा देना नाबालिगों की सुरक्षा के लिए बने कानूनी ढांचे के खिलाफ होगा। कोर्ट ने कहा कि उसे बच्चों की भलाई सुनिश्चित करनी चाहिए और ऐसे आदेश नहीं देने चाहिए जो नाबालिगों के साथ लिव-इन रिलेशनशिप को अप्रत्यक्ष रूप से बढ़ावा दें। अदालत ने कहा, “अपनी सुरक्षात्मक अधिकार-क्षेत्र का इस्तेमाल करते हुए अदालत को बहुत सावधानी बरतनी चाहिए और यह पक्का करना चाहिए कि उसका आदेश, परोक्ष रूप से भी, ऐसी किसी चीज़ को बढ़ावा न दे जिसे कानून स्पष्ट रूप से गलत मानता है।”

हाई कोर्ट ने गौर किया कि लड़की ने खुद माना था कि उसका जन्म 11 अगस्त 2009 को हुआ था और याचिका दायर करते समय वह सिर्फ़ 16 साल की थी। चूंकि वह नाबालिग थी, इसलिए याचिकाकर्ताओं द्वारा मांगी गई राहत नहीं दी जा सकती थी।

अदालत ने कहा, “इसमें कोई शक नहीं कि याचिकाकर्ता नंबर 1 नाबालिग है और इसलिए, याचिकाकर्ताओं को इस याचिका में मांगी गई राहत नहीं दी जा सकती।”

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