Supreme Court पूछा नागरिकों की जान से ज्यादा आर्थिक हितों को अहमियत क्यों
Supreme Court / सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से सवाल किया कि वह सभी दवाओं को मूल्य नियंत्रण (प्राइस कंट्रोल) के दायरे में क्यों नहीं ला पाई है। कोर्ट ने पूछा कि नागरिकों की जान से ज्यादा आर्थिक हितों को अहमियत क्यों दी जा रही है, और दवा कंपनियों को जरूरी दवाओं के लिए इतनी ऊंची कीमतें वसूलने की छूट क्यों दी जा रही है?
दवाओं की ऊंची कीमतों को चुनौती देने वाली दो याचिकाओं पर अपना आदेश सुरक्षित रखते हुए, जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच ने अधिकतम खुदरा मूल्य (MRP) और रिटेलर को मिलने वाली कीमत (PTR) के बीच के बड़े अंतर पर सवाल उठाया। बेंच ने कहा, “इसे सिर्फ व्यापार न समझें, बल्कि इसे नागरिकों की जिंदगी से जुड़ा मामला मानें। क्या यह ऐसा मामला है जहां सरकार की आर्थिक नीति नागरिकों की जान से ज्यादा महत्वपूर्ण हो जाती है?”
केंद्र सरकार ने कोर्ट को बताया कि उसने कैंसर-रोधी 137 दवाओं पर ट्रेड मार्जिन को MRP के 30% तक सीमित करने का फैसला किया है। इससे मरीजों को सालाना लगभग 2,500 करोड़ रुपये की बचत होने की उम्मीद है। हालांकि, कोर्ट ने इस बात की ओर इशारा किया कि यह फैसला उसके दखल के बाद ही लिया गया है।
बेंच ने पूछा, “आप सभी दवाओं को अपने नियंत्रण में क्यों नहीं लेते? कुछ दवाओं को ‘शेड्यूल्ड ड्रग्स’ (निर्धारित दवाओं) की श्रेणी से बाहर रखने के पीछे क्या तर्क है, जिसकी वजह से वे ‘ड्रग प्राइस कंट्रोल ऑर्डर’ (DPCO) के दायरे से बाहर हो जाती हैं?”
केंद्र सरकार की ओर से पेश हुईं एडिशनल सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी ने कहा कि सरकार बहुत ज्यादा ट्रेड मार्जिन का समर्थन नहीं करती, लेकिन वह निवेश और प्रतिस्पर्धा (कंपटीशन) को भी बचाना चाहती है।
उन्होंने कहा, “अगर वैश्विक स्तर पर देखें, तो भारत में दवाएं सबसे सस्ती हैं। सरकार इस क्षेत्र को बिना किसी नियमन (रेगुलेशन) के नहीं छोड़ती है। साथ ही, पूरी तरह से नियंत्रण रखना भी इसका समाधान नहीं हो सकता।”
बेंच ने कहा कि मरीजों के पास मोलभाव करने की कोई ताकत नहीं होती और वे ऊंची कीमतों का बोझ उठाने के लिए मजबूर होते हैं। कोर्ट ने एक उदाहरण दिया, जिसमें एक दवा वितरक ने अपनी पत्नी के इलाज के लिए कैंसर-रोधी दवा सीधे निर्माता से 1,100 रुपये में मंगवाई, लेकिन एक निजी अस्पताल ने उससे इसके लिए 1.30 लाख रुपये वसूले।
बेंच ने कहा, “ऐसा लगता है कि यह नीति कॉरपोरेट घरानों को फायदा पहुंचा रही है, जबकि आम जनता को नुकसान उठाना पड़ रहा है। हम आपको ऐसी 100 और दवाओं और उपकरणों के उदाहरण दे सकते हैं जिनकी कीमतें बहुत ज्यादा हैं। आप बस इन्हें 16% ट्रेड मार्जिन के दायरे में ला सकते हैं।” अदालत ने केंद्र के हलफनामे की आलोचना करते हुए कहा कि इसमें दवाओं की कीमतों पर संसदीय समिति की तीन रिपोर्टों का कोई जिक्र नहीं है। अदालत ने कहा, “आपका हलफनामा इन रिपोर्टों पर चुप है, क्योंकि शायद ये आपके लिए सुविधाजनक नहीं हैं।”
एएसजी भाटी ने अदालत को बताया कि सरकार ने ‘प्रधानमंत्री जन औषधि केंद्रों’ के जरिए लोगों तक जेनेरिक दवाएं पहुंचाना सुनिश्चित किया है, और सरकार गैर-अनुसूचित (non-scheduled) दवाओं की कीमतों को भी नियंत्रित करती है।
ये याचिकाएं वकील किशन चंद जैन और डॉक्टर संजय कुलश्रेष्ठ ने दायर की थीं। इनमें से एक याचिका में बताया गया कि ‘प्रधानमंत्री भारतीय जन औषधि केंद्रों’ का सालाना टर्नओवर 2,200 करोड़ रुपये है, जो पूरी इंडस्ट्री के सालाना टर्नओवर का लगभग 1% है।
निजी अस्पतालों के एक संगठन की ओर से पेश हुए वरिष्ठ वकील मुकुल रोहतगी ने कहा कि निजी स्वास्थ्य क्षेत्र की अहमियत इसलिए बढ़ी क्योंकि सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था उम्मीद के मुताबिक काम नहीं कर पाई। उन्होंने कहा कि अगर अदालत को लगता है कि अस्पताल मुनाफा अपनी जेब में रख रहे हैं, तो सच्चाई का पता लगाने के लिए एक पैनल बनाया जा सकता है।
‘आवश्यक वस्तु अधिनियम, 1955’ (Essential Commodities Act, 1955) की धारा 3 के तहत दवाओं को ‘आवश्यक वस्तु’ माना जाता है। इसी प्रावधान से मिली शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए केंद्र सरकार ‘ड्रग्स (प्राइसेस कंट्रोल) ऑर्डर, 2013’ (DPCO) जारी करती है।





