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मजार शरीफ परिसर में लाइब्रेरी और चैरिटेबल अस्पताल बनाने का प्रस्ताव, पुराने मुख्य मार्ग को बहाल करने की भी अपील
जालंधर, 6 अक्टूबर। पंजाबी भाषा के प्रसिद्ध Sufi कवि मौलवी गुलाम रसूल आलमपुरी की ऐतिहासिक मजार को राष्ट्रीय धरोहर घोषित करने की मांग उठी है। मौलवी गुलाम रसूल आलमपुरी ट्रस्ट के एडमिनिस्ट्रेटर ओम प्रकाश खेमकर्णी, जनरल मैनेजर मज़हर आलम ने केंद्र और पंजाब सरकार से मजार शरीफ के संरक्षण एवं विकास के लिए विशेष कदम उठाने की अपील की है।
ट्रस्ट के पदाधिकारियों के अनुसार, मौलवी गुलाम रसूल आलमपुरी पंजाबी सूफी साहित्य की महान विभूतियों में से एक थे। गांव आलमपुर, तहसील दसूहा, जिला होशियारपुर स्थित उनकी मजार को राष्ट्रीय धरोहर का दर्जा दिया जाना चाहिए। ट्रस्ट ने मजार शरीफ परिसर में एक लाइब्रेरी और चैरिटेबल अस्पताल स्थापित करने का प्रस्ताव भी रखा है, ताकि यहां आने वाले श्रद्धालुओं के साथ-साथ शोधकर्ताओं को भी सुविधाएं मिल सकें।
मजार तक पुराने मुख्य मार्ग को बहाल करने की मांग
ट्रस्ट ने पंजाब सरकार से मजार शरीफ तक पहुंचने वाले पुराने मुख्य मार्ग को बहाल करने की भी मांग की है। यह मार्ग दसूहा-मियानी रोड से जुड़ता है। ट्रस्ट पदाधिकारियों का कहना है कि रास्ते में कुछ समय पहले स्थापित एक स्कूल की ओर से किए गए कथित कब्जे के कारण श्रद्धालुओं और साहित्य प्रेमियों को मजार तक पहुंचने में परेशानी हो रही है।
उन्होंने प्रशासन से रास्ते की रुकावटें दूर करने और मजार शरीफ तक पहले की तरह निर्बाध आवागमन सुनिश्चित करने की मांग की है। ट्रस्ट के अनुसार, देश-विदेश से श्रद्धालु और साहित्य प्रेमी मौलवी गुलाम रसूल आलमपुरी की जियारत के लिए यहां पहुंचते हैं।
जमीन विवाद में दीवानी अदालत के अधिकार क्षेत्र पर सवाल
प्रेस नोट में मजार शरीफ से संबंधित भूमि विवाद का भी उल्लेख किया गया है। ट्रस्ट पदाधिकारियों के अनुसार, 16 दिसंबर 2025 को अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश, होशियारपुर अमित कुमार गर्ग की अदालत ने ट्रस्ट की अपील खारिज कर दी थी। मामला गांव आलमपुर, तहसील दसूहा की उस भूमि से संबंधित था, जिसे पंजाब वक्फ बोर्ड ने अपनी संपत्ति बताते हुए अजीत सिंह आदि के खिलाफ दीवानी अदालत में मामला दायर किया था।
ट्रस्ट के अनुसार, 22 मार्च 2018 को सिविल जज (जूनियर डिवीजन), दसूहा की अदालत ने वक्फ बोर्ड के पक्ष में फैसला सुनाया था। इसके खिलाफ ट्रस्ट की ओर से अतिरिक्त जिला न्यायाधीश की अदालत में अपील दायर की गई थी। ट्रस्ट का कहना है कि 16 दिसंबर 2025 के फैसले में निचली अदालत के आदेश और डिक्री को रद्द कर दिया गया, जिससे ऐसे विवादों की सुनवाई के लिए दीवानी अदालत के अधिकार क्षेत्र का प्रश्न भी उठता है।
1947 से पहले से मजार होने का रिकॉर्ड में उल्लेख
ट्रस्ट पदाधिकारियों ने अदालत में उपलब्ध रिकॉर्ड का हवाला देते हुए कहा कि मौलवी गुलाम रसूल आलमपुरी की मजार का उल्लेख 1947 से पहले के रिकॉर्ड में भी मिलता है। उन्होंने यह भी कहा कि राजस्व विभाग की गिरदावरी में मजार शरीफ का उल्लेख दर्ज होने की बात सामने आई है।
ट्रस्ट ने केंद्र और पंजाब सरकार से मांग की है कि मौलवी गुलाम रसूल आलमपुरी की साहित्यिक एवं सूफी विरासत को संरक्षित करने के लिए मजार शरीफ को राष्ट्रीय धरोहर के रूप में विकसित किया जाए। साथ ही मजार तक निर्बाध रास्ता उपलब्ध कराने और श्रद्धालुओं व शोधार्थियों के लिए आवश्यक सुविधाएं मुहैया कराने की अपील की गई है।
पंजाब, ईरान और पाकिस्तान में हो चुका है शोध
प्रेस नोट के अनुसार, मौलवी गुलाम रसूल आलमपुरी के पंजाबी काव्य पर पंजाब के भाषा विभाग, पटियाला में शोध कार्य किया जा चुका है। इसके अलावा ईरान और पाकिस्तान में भी उनकी सूफी काव्य रचनाओं पर शोध हुआ है। ट्रस्ट का कहना है कि उनकी साहित्यिक विरासत को संरक्षित करना केवल किसी एक संस्था की नहीं, बल्कि सरकार और समाज की भी जिम्मेदारी है।
मौलवी गुलाम रसूल आलमपुरी का जन्म 29 जनवरी 1849 को गांव आलमपुर, तहसील दसूहा, जिला होशियारपुर में हुआ था। उनका निधन 7 मार्च 1892 को 43 वर्ष की आयु में हुआ।
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