IIT GUWAHATI : fruit waste will clean the dirty water
IIT GUWAHATI ने निकाला समाधान, फलों के छिलके से साफ़ होगा गंदा पानी
गुवाहाटी -IIT GUWAHATI -भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) गुवाहाटी के वैज्ञानिकों ने कारखानों, उद्योगों से निकलने वाले गंदे पानी को साफ करने का एक अद्भुत तरीका खोजा है। इसके लिए शोधकर्ताओं ने फलों के कचरे का उपयोग किया है। यह समाधान किफायती और स्मार्ट होने के साथ-साथ पर्यावरण अनुकूल भी है।
प्रोफेसर डॉक्टर गोपाल दास के नेतृत्व में शोधकर्ताओं ने अनानास के ऊपरी हिस्सों और मौसमी के रेशों से बायोचार का विकास किया है। अध्ययन से पता चला है कि यह बायोचार नाइट्रोएरोमैटिक यौगिकों को कुशलतापूर्वक अवशोषित कर सकता है। यह नाइट्रोएरोमैटिक यौगिक हानिकारक रसायनों का एक वर्ग है जो आमतौर पर डाई (कपड़ा रंगने), फार्मास्यूटिकल्स, कीटनाशकों और सौंदर्य प्रसाधन जैसे उद्योगों से निकलने वाले गंदे पानी में पाया जाता है।
यह अध्ययन IIT GUWAHATI / आईआईटी, गुवाहाटी से जुड़े शोधकर्ता प्रोफेसर गोपाल दास, नेहा गौतम और सेंटर फॉर द एनवायरमेंट की वरिष्ठ तकनीकी अधिकारी डॉक्टर दीपमनी डेका द्वारा किया गया है। इस अध्ययन के नतीजे प्रतिष्ठित जर्नल केमिकल इंजीनियरिंग साइंस में प्रकाशित हुए हैं।
गौरतलब है कि नाइट्रोएरोमैटिक यौगिक नामक यह केमिकल इंसानों के साथ-साथ पर्यावरण के लिए भी हानिकारक हैं। इन रसायनों का उपयोग डाई, दवा और कीटनाशकों जैसे कई उद्योगों में किया जाता है, लेकिन जब यह पानी में छोड़े जाते हैं, तो प्रदूषण की गंभीर समस्या पैदा करते हैं। ये आसानी से विघटित नहीं होते और लम्बे समय तक पर्यावरण में बने रह सकते हैं। ऐसे में इन रसायनों को गंदे पानी से दूर करना एक बड़ी चुनौती है।
इसकी वजह से यह मछलियों, दूसरे जीवों और यहां तक की इंसानों के स्वास्थ्य को भी नुकसान पहुंचाते हैं। इनके संपर्क में आने से विषाक्तता, कैंसर और जेनेटिक म्युटेशन जैसी गंभीर स्वास्थ्य समस्याएं हो सकती हैं।
IIT GUWAHATI -किफायती होने के साथ-साथ पर्यावरण के भी है अनुकूल
देखा जाए तो इस केमिकल्स युक्त गंदे पानी को साफ करने के मौजूदा तरीके, जैसे रासायनिक और जैविक उपचार काफी महंगे हैं और इनके लिए विशेष परिस्थितियों या जटिल उपकरणों की आवश्यकता होती है। इतना ही नहीं इन्हें साफ करते समय कुछ हानिकारक उप-उत्पाद भी बनाते हैं, जिससे प्रदूषण की समस्या और बदतर हो जाती है। यही वजह है कि इसके बेहतर समाधान की खोज के लिए शोधकर्ता प्रभावी, किफायती और पर्यावरण अनुकूल तरीकों की तलाश कर रहे हैं।

इस समस्या से निपटने के लिए आईआईटी गुवाहाटी से जुड़े शोधकर्ताओं ने बायोचार का अध्ययन किया है। यह पायरोलिसिस नामक प्रक्रिया के माध्यम से फलों के कचरे से बना कार्बन युक्त पदार्थ है। पायरोलिसिस नामक इस प्रक्रिया में ऑक्सीजन की अनुपस्थिति में उच्च तापमान पर कार्बनिक पदार्थों को विघटित किया जाता है। इससे चारकोल, गैस और तरल उत्पाद तैयार किए जाते हैं।
अपने अध्ययन में शोधकर्ताओं ने अनानास के ऊपरी हिस्से और मौसमी के रेशों को चुना, जिन्हें आमतौर पर कचरे के रूप में फेंक दिया जाता है।
IIT GUWAHATI-पारंपरिक तरीकों की तुलना में बहुत तेज
इस कचरे को वैज्ञानिकों ने दो प्रकार के बायोचार में बदल दिया, इसमें पहला ऐसीबीसी (अनानास कोमोसस बायोचार) और दूसरा एमएफबीसी (साइट्रस लिमेटा बायोचार) शामिल था। इसके बाद वैज्ञानिकों ने इन बायोचारों का परीक्षण चार-नाइट्रोफेनॉल को हटाने की उनकी क्षमता को समझने के लिए किया। जो आमतौर पर उद्योगों से निकलने वाले दूषित पानी में पाया जाने वाला एक हानिकारक नाइट्रोएरोमैटिक रसायन है।
अध्ययन के नतीजे दर्शाते हैं कि ऐसीबीसी ने नाइट्रोफेनॉल के 99 फीसदी हिस्से को हटा दिया था, जबकि एमएफबीसी ऐसा करने में 97 फीसदी तक सफल रहा। शोधकर्ताओं के मुताबिक इन बायोचार्स ने बहुत तेजी से काम किया और महज पांच मिनट में प्रदूषक को अवशोषित कर लिया। यह रफ्तार पारंपरिक तरीकों की तुलना में बहुत तेज है।
बता दें कि इन पारंपरिक तरीकों में ऐसा करने में बहुत ज्यादा समय लगता है और ज्यादा ऊर्जा खर्च होती है। वहीं दूसरी तरफ यह नया तरीका कहीं ज्यादा तेज और कुशल है जो इसे बड़े पैमाने पर उपोग के लिए आदर्श बनाती है। इतना ही नहीं इसे कई बार उपयोग किया जा सकता है।
अध्ययन में इस बायोचार को लेकर एक और खास बात सामने आई है कि इसे बार-बार उपयोग किया जा सकता है। इस दौरान इसकी प्रभावशीलता भी कम नहीं होती। अध्ययन के दौरान ऐसीबीसी और एमएफबीसी दोनों बायोचार ने कई बार उपयोग होने के बाद भी अच्छा तरह से काम किया। इसका मतलब है कि इनका प्रभावशीलता खोए बिना कई बार उपयोग किया जा सकता है।
यह विशेषता इन्हें न केवल किफायती और पर्यावरण अनुकूल विकल्प बनाती है, साथ ही इनकी मदद से उद्योगों द्वारा लम्बे समय तक दूषित जल को साफ करना आर्थिक रूप से व्यवहार्य हो जाता है।

नदियों, झीलों को साफ करने में हो सकते हैं मददगार
प्रोफेसर गोपाल दास ने इस बारे में प्रेस विज्ञप्ति में कहा, “यह शोध दर्शाता है कि कैसे कचरे को पर्यावरण के संरक्षण के लिए कीमती संसाधन में बदला जा सकता है।” उनके मुताबिक औद्योगिक प्रदूषण से निपटने के लिए फलों के कचरे का उपयोग करके हम न केवल जल प्रदूषण की समस्या से निपट रहे हैं साथ ही कचरे का बेहतर प्रबंधन करके सर्कुलर इकोनॉमी को भी बढ़ावा दे रहे हैं।
वैज्ञानिकों के मुताबिक यह विधि उद्योगों से निकलने वाले गंदे पानी को साफ करने से कहीं ज्यादा काम आ सकती है। इनका उपयोग गांवों में पीने के पानी को सुरक्षित बनाने के लिए वाटर फिल्टर में किया जा सकता है। इसी तरह यह प्रदूषित नदियों और झीलों की सफाई में मददगार साबित हो सकती है। साथ ही औद्योगिक प्रदूषण से जूझ रहे क्षेत्रों में मिट्टी की गुणवत्ता में सुधार लाने में मददगार साबित हो सकती है।
शोधकर्ताओं के अनुसार चूंकि यह तरीका सस्ता, प्रभावी और पर्यावरण अनुकूल है, ऐसे में यह पारंपरिक जल उपचार विधियों का एक बढ़िया विकल्प साबित हो सकता है। क्रेडिट- DOWN TO EARTH
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