Kidney Racket
जालंधर। Kidney Racket : 2015 में हुए अवैध किडनी ट्रांसप्लांट केस की अगली सुनवाई 17 जुलाई 2026 को है। इस दिन CrPC की धारा 313 के तहत आरोपियों के बयान दर्ज किये जाने हैं। इस केस के मुख्य आरोपियों में शामिल हैं सर्वोदय अस्पताल के डॉक्टर राजेश अग्रवाल, दीपा अग्रवाल, डॉ संजय मित्तल, सुमन मित्तल, न्यू रूबी अस्पताल में कार्यरत डॉ. पुनीत पाल ग्रोवर सहित कई अन्य डॉक्टर और प्रबंधक भी जिन पर कई संगीन धाराओं के तहत केस चल रहे हैं। पुनीत पाल ग्रोवर तब JUNIOR SERGEON थे।
Kidney Racket – सब जानते हैं कि यह मामला लोगों की जान माल से सीधे तौर पर जुड़ा है। इसके बावजूद 12 साल का समय बीत जाने के बाद भी इस अवैध किडनी ट्रांसप्लांट केस में अभी तक लोगों को इन्साफ नहीं मिला है। शिकायतकर्ता के प्रयत्नों के अलावा, विटनेस विंडो खोलने के लिए पब्लिक प्रॉसिक्यूशन ने भी सेशन कोर्ट में अपील लगाई थी पर नतीजा वही ढाक के तीन पात।
संदीप कौर गिल जुडिशियल मजिस्ट्रेट फर्स्ट क्लास की कोर्ट में हुईं पिछली कार्यवाही पर गौरव करें तो आरोपियों जुनैद अहमद, हरविंदर सिंह, दीपा अग्रवाल, डॉ. राजेश अग्रवाल, मंजीत रानी, सुनीता वर्मा, अंकुर अनेजा (छूट प्राप्त), सत्य प्रकाश, प्रदीप कुमार जैन, आयुष कुमार जैन, सुजाता खुराना, मोहिंदर कुमार खुराना, सुदेश कुमारी चावला, चंद्रा कौल, गोविंद कौल, मेहरू निसा और सुनीता वर्मा की तरफ से दी गई निजी पेशी छूट की अर्ज़ी को देखते हुए इनको कोर्ट में मौजूदगी से छूट दी गई थी।
हालाँकि, साथ ही माननीय जज साहिबा संदीप कौर गिल की कोर्ट ने आरोपियों को निर्देश दिया था कि वे CrPC की धारा 313 के तहत अपना बयान दर्ज कराने के लिए सुनवाई की अगली तारीख 17 जुलाई को पर पेश हों। पिछली बार कोर्ट में मौजूद आरोपियों के बयान इसलिए दर्ज नहीं किए गए क्योंकि उनके वकीलों ने अनुरोध किया था कि उन्हें समय चाहिए।
Kidney Racket – DRME के सुपरिंटेंडेंट सौदागर चंद की गवाही क्यों नही ?
सनद रहे सबसे अहम गवाह DRME के सुपरिंटेंडेंट सौदागर चंद ने पुलिस को कई पेजों का बयान दिया था जिसमें साफ़ साफ़ लिखा था कि डॉ राजेश अग्रवाल, डॉ संजय मित्तल और अन्य डॉक्टरों/ प्रबंधकों को इललीगल किडनी ट्रांसप्लांट में दोषी पाया जाता है। इन्होंने कई किडनी ट्रांसप्लांट बिना NOC लिए किये हैं। इसके चलते नेशनल किडनी हॉस्पिटल के इन डॉक्टरों का लाइसेंस भी रद्द हुआ था। ये एक बहुत ही महत्वपूर्ण गवाही थी क्योंकि DRME सरकार की एक रेगुलेटरी बॉडी है जो इस तरह के मामलों की जांच करती है और ऑर्गन ट्रांसप्लांट का लाइसेंस देती है। हालाँकि गड़बड़ी का शक DRME पर भी उठ रहा है क्योंकि बाद में इस बॉडी ने आरोपी डॉक्टर को लाइसेंस फिर से दे दिया।
सौदागर चंद ने पुलिस को दिए अपने ब्यान में कहा भी था कि जरूरत पड़ने पर वो अपनी गवाही अदालत में देंगे और इस केस से जुड़े सारे दस्तावेज उनके डिपार्टमेंट के पास मौजूद हैं। ऐसे में उनकी गवाही न होना गंभीर सवाल खड़े करता है।
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