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Reading: HIGH COURT ने गुज़ारा-भत्ता अर्जी ख़ारिज की, कहा-पढ़ी लिखी हो, खुद कमाओ
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HIGH COURT ने गुज़ारा-भत्ता अर्जी ख़ारिज की, कहा-पढ़ी लिखी हो, खुद कमाओ

The Telescope Times
Last updated: October 9, 2026 8:46 pm
The Telescope Times Published October 9, 2026
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HIGH COURT/हाई कोर्ट ने एक पत्नी की अपने पति से गुज़ारा-भत्ता (मेंटेनेंस) पाने की अर्ज़ी को यह कहते हुए खारिज कर दिया कि वह पढ़ी-लिखी है और अपना गुज़ारा खुद कर सकती है। कोर्ट ने निचली अदालत के उस फ़ैसले को सही ठहराया जिसमें पाया गया था कि पत्नी अपनी मर्ज़ी से ससुराल छोड़कर चली गई थी और पति की कोशिशों के बावजूद लौटने से इनकार कर दिया था। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने यह फैसला सुनाया।

हाई कोर्ट ने कहा कि CrPC की धारा 125 का मुख्य मकसद बेघर और बेसहारा होने से बचाना है। हालांकि, कोर्ट ने यह भी कहा कि पत्नी की पढ़ाई-लिखाई और कमाने की क्षमता यह तय करने में अहम है कि क्या वह अपना गुज़ारा करने में असमर्थ है।

इस जोड़े की शादी 16 अप्रैल 2022 को हिंदू रीति-रिवाजों से हुई थी। कुछ दिन ससुराल में रहने के बाद, पत्नी रक्षाबंधन के मौके पर अपने चाचा के साथ मायके चली गई। उसके बाद वह नहीं लौटी।

इसके बाद, उसने CrPC की धारा 125 के तहत गुज़ारा-भत्ते की अर्ज़ी दायर की और आरोप लगाया कि उसे दहेज की मांग को लेकर प्रताड़ित किया गया और ससुराल छोड़ने के लिए मजबूर किया गया।

उसने यह भी आरोप लगाया कि उसके पति के पास काफ़ी पैसे हैं, लेकिन उसने उसकी देखभाल करने से इनकार कर दिया और उसे नज़रअंदाज़ किया।

पत्नी बेरोज़गार, पति महीने में ₹1.5 लाख कमाता है
पत्नी की तरफ़ से पेश वकील ने हाई कोर्ट को बताया कि भले ही वह पढ़ी-लिखी है, लेकिन वह बेरोज़गार है और आर्थिक रूप से दूसरों पर निर्भर है। उन्होंने यह भी बताया कि उसका पति एक सॉफ्टवेयर इंजीनियर है और महीने में लगभग ₹1.5 लाख कमाता है।

पत्नी के वकील ने तर्क दिया कि उसके पास अलग रहने की ठोस वजहें थीं और उसके पति के पास गुज़ारा-भत्ता देने की आर्थिक क्षमता है।

इसके जवाब में, पति के वकील ने कहा कि वह बेरोज़गार है, उसके नाम पर कोई संपत्ति नहीं है और वह गुज़ारे के लिए अपने माता-पिता पर निर्भर है।

पति की कोशिशों के बावजूद पत्नी ने लौटने से इनकार किया
फ़ैमिली कोर्ट ने मौखिक और दस्तावेज़ी सबूतों के आधार पर यह पाया था कि पति ने अपनी पत्नी को ससुराल वापस लाने की सच्ची कोशिशें की थीं, लेकिन उसने लौटने से इनकार कर दिया था। जांच के नतीजों के अनुसार, पत्नी रक्षाबंधन पर अपनी मर्ज़ी से अपने चाचा के साथ मायके चली गई थी। बाद में, उसने बिना किसी ठोस वजह के लौटने से इनकार कर दिया।

पत्नी गुज़ारा-भत्ते का केस क्यों हार गई?
CrPC की धारा 125 कुछ खास हालात में गुज़ारा-भत्ते के लिए कानूनी उपाय देती है। गुज़ारा-भत्ते के दावे में इन बातों पर विचार किया जाता है: क्या पति के पास पर्याप्त साधन हैं, क्या पत्नी अपना गुज़ारा करने में असमर्थ है, और क्या उसने बिना किसी ठोस वजह के पति के साथ रहने से इनकार किया है।

इस मामले में, फ़ैमिली कोर्ट ने पाया कि पत्नी अपनी मर्ज़ी से ससुराल छोड़कर गई थी और पति की कोशिशों के बावजूद लौटने से इनकार कर दिया था। अदालत ने माना कि वह बिना किसी ठोस वजह के अलग रह रही थी, जिससे CrPC की धारा 125(4) के तहत रोक लागू होती है।

अदालत ने यह तय करते समय कि क्या वह अपना गुज़ारा करने में असमर्थ है, उसकी पढ़ाई-लिखाई और कमाने की क्षमता पर भी विचार किया।

इन्हीं बातों के आधार पर उसका गुज़ारा-भत्ते का दावा खारिज कर दिया गया।

हाई कोर्ट ने रिविज़नल अधिकार क्षेत्र की सीमाएं बताईं
हाई कोर्ट ने CrPC की धारा 397 और 401 के तहत अपनी रिविज़नल शक्तियों के सीमित दायरे पर भी ज़ोर दिया।

अदालत ने कहा कि रिविज़नल अधिकार क्षेत्र का इस्तेमाल करते समय हाई कोर्ट अपीलीय अदालत की तरह काम नहीं करता है और आम तौर पर सबूतों का दोबारा मूल्यांकन या दोबारा जांच नहीं करता, सिर्फ़ इसलिए नहीं कि कोई दूसरा नज़रिया भी हो सकता है।

हस्तक्षेप तभी ज़रूरी होता है जब निचली अदालत के निष्कर्ष साफ़ तौर पर गलत, गैर-कानूनी या अधिकार क्षेत्र की गंभीर गलती से प्रभावित हों।

हाई कोर्ट को हस्तक्षेप का कोई आधार नहीं मिला
मामले की जांच के बाद, इलाहाबाद हाई कोर्ट ने माना कि फ़ैमिली कोर्ट ने मामले के तथ्यों पर CrPC की धारा 125(4) को सही ढंग से लागू किया था।

हाई कोर्ट को निचली अदालत के फ़ैसले में कोई गैर-कानूनी बात, अनियमितता या गलत बात नहीं मिली जिसके लिए हस्तक्षेप किया जा सके। इसलिए, उसने गुज़ारा-भत्ता न देने के फ़ैसले को चुनौती देने वाली पत्नी की याचिका खारिज कर दी।

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