जालंधर। DBA ELECTION 2026 : डिस्ट्रिक्ट बार एसोसिएशन जालंधर के चुनाव 11 सितंबर को होने हैं। जैसे-जैसे मतदान का दिन पास आ रहा है, चुनावी सरगर्मियां तेज होती जा रही हैं। इसी बीच अब चुनाव प्रचार के दौरान होने वाले लंच, डिनर और अन्य कार्यक्रमों को लेकर भी वकीलों के साथ-साथ शहर के लोगों में सवाल उठने लगे हैं।
बुधवार, 9 सितंबर को दोपहर 12 बजे वकीलों के लिए आयोजित किए जा रहे एक लंच का इनविटेशन धीरज सेठ की ओर से अपने स्टेटस पर साझा किया गया है। इनविटेशन में वीके सरीन, हर्षवर्धन कोहली और अशोक शर्मा की ओर से लंच दिए जाने का उल्लेख है। वकीलों से इसमें शामिल होने और चुनाव में समर्थन देने की अपील की गई है।
अब सवाल यह उठ रहा है कि क्या चुनाव में वोट मांगने के लिए लंच और डिनर जैसे आयोजनों पर लाखों रुपये खर्च करना चुनावी प्रक्रिया का सामान्य हिस्सा बन गया है? ऐसे में वो लोग क्या करेंगे या कहाँ जायेंगे जो चुनाव तो लड़ना चाहते हैं पर लाखों नहीं खर्च सकते। वकील के केस लड़ने की योग्यता के बजाय किन चीजों पर फोकस किया जा रहा?
चर्चा यह भी है कि डीबीए चुनाव में लगभग सभी प्रमुख पदों के उम्मीदवार अपने-अपने स्तर पर लंच, डिनर और अन्य कार्यक्रम आयोजित करते हैं। महिला वकीलों के लिए अलग कार्यक्रम और अलग-अलग होटलों में डिनर -लंच आयोजित किया जाते हैं। ऐसे में बड़ा सवाल है कि इन आयोजनों का खर्च आखिर कौन उठाता है और इसका उद्देश्य क्या है?
क्या बड़ी संख्या में वकीलों को खाना खिलाकर उन्हें प्रभावित करने या अपने पक्ष में वोट करने के लिए प्रेरित किया जाता है? अगर कोई उम्मीदवार या उसके समर्थक अपनी जेब से इतना पैसा खर्च कर रहे हैं तो आखिर इतनी बड़ी रकम खर्च करने की जरूरत क्यों महसूस होती है?
खर्च कौन कर रहा है और क्यों?
अब स्वाभाविक सवाल है कि क्या इन लंच-डिनर का पूरा खर्च कैंडिडेट्स द्वारा उठाया जा रहा है या इसके पीछे कोई और व्यवस्था है?
इस बात पर जब चुनाव लड़ रहे SUNNY KUMAR से पूछा गया तो उनका कहना था कि ये सब करना पड़ता है। वहीँ पर सब एकजुट होते हैं तो आप वोट मांग लेते हो। हालांकि उनका ये भी कहना था कि वकील सब तरफ खाना खाने जाते हैं। लेकिन चुनावी माहौल में इस तरह के आयोजनों ने पैसे और चुनावी राजनीति के संबंध को लेकर बहस जरूर छेड़ दी है।
क्या चुनाव जीतने के बाद इस खर्च की भरपाई होती है?
कुछ वरिष्ठ वकीलों से बातचीत के बाद एक और गंभीर सवाल सामने आया है। उनका कहना है कि डीबीए का चुनाव लड़ना अब पहले की तुलना में काफी खर्चीला हो गया है। एक बार में ही बस हो जाती है। अगर कोई व्यक्ति एक चुनाव में बड़ी रकम खर्च करता है, तो यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि वह पैसा कहां से आता है और आखिर इस खर्च का उद्देश्य क्या है? क्या बाद में केस लेकर आये लोगों से ज्यादा चार्ज करके इस रकम की भरपाई की जाती है।
युवा वकीलों को क्या संदेश?
सबसे बड़ा सवाल शायद आने वाली पीढ़ी को लेकर है। जो युवा कानून की पढ़ाई पूरी करके वकालत के पेशे में प्रवेश कर रहे हैं, वे अपने वरिष्ठों और चुनावी प्रक्रिया को देखकर क्या सीख रहे हैं? क्या उन्हें यह संदेश जा रहा है कि बार एसोसिएशन का चुनाव लड़ने के लिए योग्यता, अनुभव, नेतृत्व और वकीलों के हितों के बजाय पैसा खर्च करने की क्षमता भी जरूरी है?
लंच और डिनर कराना अपने आप में गलत है या नहीं, यह अलग बहस का विषय हो सकता है। लेकिन चुनाव के दौरान होने वाले बड़े खर्च, उसके स्रोत और उसके उद्देश्य को लेकर पारदर्शिता जरूर होनी चाहिए। डीबीए जैसे प्रतिष्ठित संस्थान के चुनाव में असली मुकाबला विचार, योग्यता, ईमानदारी, अनुभव और वकीलों के हितों के लिए काम करने की क्षमता का होना चाहिए न कि महंगे लंच और डिनर का?





